Ad Code

मिज़ोरम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने की सर्पों की एक नई प्रजाति Smithophis Leptofasciatus की खोज !

 हाल ही में मिज़ोरम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने वर्षा-प्रिय सर्पों की एक नई प्रजाति की खोज की है, जिसका वैज्ञानिक नाम स्मिथोफिस लेप्टोफास्सियाटस (Smithophis Leptofasciatus) रखा गया है। यह प्रजाति स्मिथोफिस (Smithophis ) वंश (Genus) से संबंधित है, जो अर्ध-जलीय (Semi-Aquatic)  साँपों के लिए जाना जाता है। ये प्रायः ऐसे क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ वर्षा अधिक होती है और नमी प्रचुर मात्रा में होती है।

Smithophis Leptofasciatus
Smithophis Leptofasciatus

इस नए साँप का नाम ग्रीक और लैटिन शब्दों के संयोजन से लिया गया है। “लेप्टो” का अर्थ है संकरी  या पतली, और “फास्सियाटस” का अर्थ है पट्टेदार । नाम का अर्थ है संकरे पट्टों वाला”, जो इसकी पीठ पर मौजूद विशिष्ट धारियों (Dorsal Markings) को दर्शाता है। इसे सामान्य रूप से संकरी पट्टियों वाला वर्षा-साँप (Narrow-banded rain snake) भी कहा जाता है।

Smithophis Leptofasciatus
Narrow-Banded Rain Snake


शोधकर्ताओं के अनुसार, यह प्रजाति मिज़ोरम के उष्णकटिबंधीय पर्वतीय वनों (tropical montane forests) में 900 से 1200 मीटर की ऊँचाई पर पाई गई। इस ऊँचाई पर वर्षा अधिक होती है, तापमान ठंडा रहता है और वनस्पति घनी होती है — जो इस प्रजाति के जीवन-चक्र के लिए आदर्श वातावरण है। प्रारंभिक अध्ययन बताते हैं कि यह साँप जलस्रोतों के पास और गीली भूमि पर सक्रिय रहता है, जहाँ यह मुख्य रूप से छोटे उभयचर, कीट और अन्य अकशेरुकी जीवों का शिकार करता है।


इस खोज के साथ ही, ज्ञात स्मिथोफिस प्रजातियों की कुल संख्या पाँच हो गई है, और सभी उत्तर-पूर्वी भारत तथा इसके आस-पास के क्षेत्रों में पाई जाती हैं।

 विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकार की नई खोजें न केवल क्षेत्र की जैव-विविधता का महत्व बढ़ाती हैं, बल्कि संरक्षण की आवश्यकता पर भी बल देती हैं। ऐसे दुर्लभ और सीमित वितरण वाले जीव पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनका संरक्षण स्थानीय जल-स्रोतों, वनस्पतियों और अन्य वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए भी आवश्यक है।

 

Post a Comment

0 Comments

Close Menu